अंतिम क्षण में ॐ उच्चारण का महत्व

ॐ मंत्र उच्चारण से आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता हे
अंतिम क्षण में ॐ उच्चारण का महत्व  | मनुष्य जीवन का उदेश्य मृत्यु के चक्र से निकल कर मोक्ष प्राप्त करना हे | आत्मा का परमात्मा से मिलन कैसे होता हे | ॐ मंत्र उच्चारण से आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता हे

अंतिम क्षण में ॐ उच्चारण का महत्व | श्रीमद भगवद गीता | Shrimad Bhagavad Gita | गीता सार | Bhagwat Gita Saar

माया क्या हे | संसार को परमात्मा की माया क्यों कहा जाता हे | परमात्मा कण-कण में समाया हुआ है


संसार को परमात्मा की माया क्यों कहा जाता हे | परमात्मा कण-कण में समाया हुआ है
माया क्या है? सांख्ययोग का ज्ञान
रिश्ते नाते का चक्रव्यूह कैसे चलता हे?
मृत्यु के बाद संबंध समाप्त हो जाता हे
 रिश्ते नाते मोह को उत्पन्न करते है

माया क्या हे | श्रीमद भगवद गीता | Shrimad Bhagavad Gita | गीता सार | Bhagwat Gita Saar

स्थितप्रज्ञ मनुष्य  की बुद्धि स्थिर रहती हे


स्थितप्रज्ञ मनुष्य  की बुद्धि स्थिर रहती हे
स्थित प्रज्ञ व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को विषयों से समेट कर उन्हें अपने वश में कर लेता है तथा मन को ईश्वर में लीन कर लेता है

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥

विषयोंका निरंतर चिंतन करनेवाले पुरुषकी विषयोंमें आसक्ति हो जाती है, आसक्तिसे उन विषयोंकी कामना उत्पन्न होती है और कामनामें (विघ्न पडनेसे) क्रोध उत्पन्न होता है ।क्रोधसे संमोह (मूढभाव) उत्पन्न होता है, संमोहसे स्मृतिभ्रम होता है (भान भूलना), स्मृतिभ्रम से बुद्धि अर्थात् ज्ञानशक्तिका नाश होता है, और बुद्धिनाश होने से सर्वनाश हो जाता है । 

 यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेऽभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

कछुवा सब ओरसे अपने अंगोंको जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह (महात्मा) इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे ह्टा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (एसा समज) । 
ज्ञान से बुध्दि, बुध्दि से मन और मन से इन्द्रियों को वश करनाचाहिए

स्थितप्रज्ञ की परिभाषा | श्रीमद भगवद गीता | Shrimad Bhagavad Gita | गीता सार | Bhagwat Gita Saar

परिवर्तन प्रकृति का नियम 



प्रकृति अर्थात् क्या हे ? प्र = विशेष और कृति = किया गया। स्वाभाविक की गई चीज़ नहीं। लेकिन विभाव में जाकर, विशेष रूप से की गई चीज़, वही प्रकृति है।

प्रकृति के तीन गुण से ( सत्त्व , रजस् और तमस् ) सृष्टि की रचना हुई है । ये तीनों घटक सजीव-निर्जीव, स्थूल-सूक्ष्म वस्तुओं में विद्यमान रहते हैं । इन तीनों के बिना किसी वास्तविक पदार्थ का अस्तित्व संभव नहीं है। किसी भी पदार्थ में इन तीन गुणों के न्यूनाधिक प्रभाव के कारण उस का चरित्र निर्धारित होता है।

सत्वगुण का अर्थ "पवित्रता" तथा "ज्ञान" है। सत्व अर्थात अच्छे कर्मों की ओर मोड़ने वाला गुण खा हे | तीनों गुणों ( सत्त्व , रजस् और तमस् ) में से सर्वश्रेष्ठ गुण सत्त्व गुण हे सात्विक मनुष्य – किसी कर्म फल अथवा मान सम्मान की अपेक्षा अथवा स्वार्थ के बिना समाज की सेवा करना ।

सत्त्वगुण दैवी तत्त्व के सबसे निकट है । इसलिए सत्त्व प्रधान व्यक्ति के लक्षण हैं – प्रसन्नता, संतुष्टि, धैर्य, क्षमा करने की क्षमता, अध्यात्म के प्रति झुकाव । एक सात्विक व्यक्ति हमेशा वैश्विक कल्याण के निमित्त काम करता है। हमेशा मेहनती, सतर्क होता है । एक पवित्र जीवनयापन करता है। सच बोलता है और साहसी होता है।

रजस् का अर्थ क्रिया तथा इच्छाएं है। राजसिक मनुष्य – स्वयं के लाभ तथा कार्यसिद्धि हेतु जीना । जो गति पदार्थ के निर्जीव और सजीव दोनों ही रूपों में देखने को मिलती वह रजस् के कारण देखने को मिलती है। निर्जीव पदार्थों में गति और गतिविधि, विकास और ह्रास रजस् का परिणाम हैं वहीं जीवित पदार्थों में क्रियात्मकता, गति की निरंतरता और पीड़ा रजस के परिणाम हैं।

तमस् का अर्थ अज्ञानता तथा निष्क्रियता है। तामसिक मनुष्य – दूसरों को अथवा समाज को हानि पहुंचाकर स्वयं का स्वार्थ सिद्ध करना | तम प्रधान व्यक्ति, आलसी, लोभी, सांसारिक इच्छाओं से आसक्त रहता है ।

तमस् गुण के प्रधान होने पर व्यक्ति को सत्य-असत्य का कुछ पता नहीं चलता, यानि वो अज्ञान के अंधकार (तम) में रहता है। यानि कौन सी बात उसके लिए अच्छी है वा कौन सी बुरी ये यथार्थ पता नहीं चलता और इस स्वभाव के व्यक्ति को ये जानने की जिज्ञासा भी नहीं होती।

प्रकृति के तीन गुण सत्व,रजस,तमस की परिभाषा | श्रीमद भगवद गीता | Shrimad Bhagavad Gita | गीता सार | Bhagwat Gita Saar

श्रीमद भगवद गीता अनुसार कर्म और कर्मयोगी की परिभाषा प्रारब्ध क्या हे कैसे बनती हे और उसे कौन बनाता हे ? | निष्काम कर्म योग किसे कहते हे


श्रीमद भगवद गीता अनुसार कर्म और कर्मयोगी की परिभाषा प्रारब्ध क्या हे कैसे बनती हे और उसे कौन बनाता हे ? | निष्काम कर्म योग किसे कहते हे

प्रारब्ध में न हो तो मुँह तक पोहकचर भी निवाला छीन जाता हे
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।। 

कर्मण्ये वाधिका रस्ते मा फलेषु कदाचन । 
मा कर्म फल हेतुरभुह, माँ ते संगोत्स्व कर्मण्ये।।


प्रारब्ध क्या हे कैसे बनती हे और उसे कौन बनाता हे ? | निष्काम कर्म योग | NISHKAM KARMA YOGA

                                Veeron Ke Veer Bahubali 2 The Conclusion



बाहुबली 2: द कॉन्क्लूज़न, बाहुबली: द बिगनिंग फ़िल्म का दूसरा भाग है। यह एक ऐतिहासिक फिक्शन फ़िल्म है। इस फ़िल्म को तेलुगू और तमिल भाषा में बनाया गया है । हिन्दी, मलयालम और अन्य भाषाओं में इसकी डबिंग की गयी है। इसका निर्देशन एस॰एस॰ राजामौली ने किया है। यह 8 जुलाई 2016 को सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने वाली थी। लेकिन इसके निर्माण में देरी के कारण यह समय और आगे बढ़ा दिया गया।और यह 28 अप्रैल 2017 मे प्रदर्शित की गयी। शुरू में, दोनों भागों को संयुक्त रूप से  ​​250 करोड़ ( 2.5 अरब) के बजट पर तैयार किया गया,हालांकि बाद में दूसरे भाग का बजट 200 करोड़ बढ़ा दिया गया और इस प्रकार कुल मिलकर दोनों फिल्मों का बजट 450 करोड़ हो गया। इस तरह, बाहुबली 2: द कॉन्क्लूज़न भारतीय सिनेमा इतिहास की सबसे महंगी फिल्म हो गयी।
इस फ़िल्म ने रिलीज़ से पहले ही ₹ 500 करोड़ ( 5 अरब) का बिजनेस का कीर्तिमान बनाया है।
फिल्म को 28 अप्रैल 2017 को दुनिया भर में प्रदर्शित किया गया। बाहुबली-2 4K हाई-डेफिनिशन में रिलीज़ होने वाली पहली तेलुगु फिल्म है। फ़िल्म की रिलीज की तारीख से पहले 200 स्क्रीन के करीब 4K प्रोजेक्टर्स को अपग्रेड किया गया। बाहुबली-2 पूरी दुनिया में पहली भारतीय फिल्म बन गई है, जिसने सभी भाषाओं में 1000 करोड़ (10 बिलियन) से अधिक कमाई की है। और पूरी दुनिया में पहली भारतीय फिल्म बन गई है, जिसने 3 दिनों में सभी भाषाओं में 500 करोड़ ( 5 बिलियन) से अधिक कमाई की है। यह पहले सप्ताह में 128 करोड़ रूपए से ज्यादा कमाई वाली पहली हिंदी फिल्म है।

Veeron Ke Veer Bahubali 2 The Conclusion | वीरों के वीर आ | Talking tom

वासुदेव पौंड्रक ने जब हनुमानजी पे सुदर्शन चक्र चलाया


वासुदेव पौंड्रक ने जब हनुमानजी पे सुदर्शन चक्र चलाया | Vasudev Paundrak Vs Hanumanji

श्री कृष्ण को रणछोड़ क्यों कहते हे





मुचुकुन्द त्रेता युग में इक्ष्वाकु वंश के राजा थे।मुचुकुन्द ने देवताओं का साथ देकर और दानवों का संहार किया था जिसके कारण देवता युद्ध जीत गए। तब इन्द्र ने उन्हें वर मांगने को कहा। उन्होंने वापस पृथ्वीलोक जाने की इच्छा व्यक्त की। तब इन्द्र ने उन्हें बताया कि पृथ्वी पर और देवलोक में समय का बहुत अंतर है जिस कारण अब वह समय नहीं रहा और सब बंधू मर चुके हैं उनके वंश का कोई नहीं बचा। यह जान मुचुकंद दु:खी हुए और वर माँगा कि उन्हें सोना है। तब इन्द्र ने वरदान दिया कि किसी निर्जन स्थान पर सो जाये और यदि कोई उन्हें उठाएगा तो मुचुकंद की दृष्टि पड़ते ही वह भस्म हो जायेगा।

कालयवन एक पौराणिक चरित्र है जो यवन देश का राजा था। जन्म से ब्राह्मण, पर कर्म से म्लेच्छ (मलेच्छ) था। शल्य ने जरासंध को यह सलाह दी कि वे कृष्ण को हराने के लिए कालयवन से सहायता मांगे।
मुचुकुन्द को यह वर मिला था कि जो कोई उन्हें सोते से उठायेगा वह उनकी दृष्टि पड़ते ही भस्म हो जायगा। कृष्ण ने ऐसा किया कि कालयवन मुचुकुन्द द्वारा भस्म कर दिया गया।

श्री कृष्ण को रणछोड़ क्यों कहते हे | मुचुकुन्द और कालयवन की कथा | Kalyavan or Muchukund Katha

कृष्ण और जरासंध के बीच भीषण युद्ध



 कृष्ण और बलराम ने जरासंद को परास्त किया था 

जरासंध महाभारत कालीन मगध राज्य का नरेश था। वह बहुत ही शक्तिशाली राजा था मथुरा नरेश कंस का ससुर एवं परम मित्र था उसकी दोनो पुत्रियो आसित एव्म प्रापित का विवाह कंस से हुआ था। श्रीकृष्ण से कंस वध का प्रतिशोध लेने के लिए युध्द कर रहा था जरासंध श्री कृष्ण का परम शत्रु और एक योद्धा था।

कृष्ण और जरासंध के बीच भीषण युद्ध | War between Jarasandh and Shree Krishna

कृष्ण ने अपने गुरु संदीपन को गुरु दक्षिणा में गुरु पुत्र को वापस लाने का वचन दिया था






गुरु संदीपन के आश्रम में कृष्ण-बलराम और सुदामा ने वेद-पुराण का अध्ययन प्राप्त किया था।कृष्ण को अद्वितीय मान गुरु दक्षिणा में संदीपन ने कृष्ण से मांगा कि उनका पुत्र पुनर्दत्त सागर में कहि खो गया था, वे उसे वापस ला दे। बलराम और कृष्ण प्रभास क्षेत्र के समुद्र तट पर गए और सागर जल से कहा कि वे गुरु के पुत्र को लौटा दें। सागर ने उत्तर दिया और बोला कि यहाँ पर कोई बालक नहीं है। सागर ने बताया कि पंचजन नामक सागर दैत्य, जो शंखासुर नाम से भी प्रसिद्ध है, उसने सम्भवतया बालक को चुरा लिया होगा। । पंचजन राक्षस की तलाश में श्री कृष्ण सागर में उतरे और उन्होंने उसका वध किया।

कृष्ण बालक की खोज में सागर में उतरे, दैत्य को तलाशा और उसे मार डाला। दैत्य का उदर चीरा तो कृष्ण को वहाँ पर कोई बालक नहीं मिला। शंखासुर के शरीर का शंख लेकर कृष्ण और बलराम यम के पास पहुँचे। यमलोक में शंख बजाने पर अनेक गण उत्पन्न हो गए। यमराज ने कृष्ण की माँग पर गुरु पुत्र उन्हें लौटा दिया। वे बालक के साथ गुरु संदीपन के पास गए और गुरु पुत्र के रूप में गुरु को गुरु दक्षिणा दी।

जब कृष्ण और बलराम पुनर्दत्त को लेने यमलोक पोहचे | शंखासुर का वध | पांचजन्य शंख की प्राप्ति | KRISHNA BALRAM MEET YAMA IN YAMLOK | | संदीपनी मुनि गुरुदक्षिणा

जब श्री कृष्ण ने कालिया नाग का वध किया | KALIYA NAAG COMPLETE STORY



कालिय नाग कद्रू का पुत्र और पन्नग जाति का नागराज था। वह पहले रमण द्वीप में निवास करता था, किंतु पक्षीराज गरुड़ से शत्रुता हो जाने के कारण वह यमुना नदी में कुण्ड में आकर रहने लगा था। यमुनाजी का यह कुण्ड गरुड़ के लिए अगम्य था, क्योंकि इसी स्थान पर एक दिन क्षुधातुर गरुड़ ने तपस्वी सौभरि के मना करने पर भी अपने अभीष्ट मत्स्य को बलपूर्वक पकड़कर खा डाला था, इसीलिए महर्षि सौभरि ने गरुड़ को शाप दिया था कि- "यदि गरुड़ फिर कभी इस कुण्ड में घुसकर मछलियों को खायेंगे तो उसी क्षण प्राणों से हाथ धो बैठेंगे"। कालिय नाग यह बात जानता था, इसीलिए वह यमुना के उक्त कुण्ड में रहने आ गया था।
कालिय नाग ने  विष से यमुना का जल ज़हरीला हो गया। उसे पीकर गाय और गोप मरने लगे। एक बार जब खेलते समय गेंद यमुना में गिर जाने से कृष्ण उसे निकालने के लिए यमुना में कूदे और
कालिया नाग के एक सौ एक सिर थे। वह अपने जिस शरीर को नहीं झुकाता था, उसी को प्रचण्ड दण्डधारी भगवान् अपने पैरों की चोट से कुचल डालते। इससे कालिया नाग की जीवनशक्ति क्षीण हो चली, वह मुंह और नथुनों से खून उगलने लगा। अन्त में चक्कर काटते-काटते वह बेहोश हो गया। अपने पति की यह दशा देखकर उसकी पत्नियां भगवान् की शरण में आयीं। और बोली अपराध सह लेना चाहिए। यह मूढ है, आपको पहचानता नहीं है, इसलिए इसे क्षमा कर दीजिए। भगवन् कृपा कीजिए, अब यह सर्प मरने ही वाला है। नागपत्नियों की याचना से भगवान पिघल गए। कालिया को मृत्युदण्ड देने का इरादा त्याग दिया।
भगवान के प्रहारों से आहत कालिया का दंभ भी टूट चुका था। धीरे-धीरे कालिया नाग की इन्द्रियों और प्राणों में कुछ-कुछ चेतना आ गई
कालिय को युद्ध में हराने के बाद उसके फण पर नाचने लगे। उन्होंने गरुड़ से निर्भयता का वरदान देकर कालिय को पुन: रमण द्वीप भेज दिया। यमुना का यह स्थान आज भी 'कालियदह' कहलाता है।

जब श्री कृष्ण ने कालिया नाग का वध किया | KALIYA NAAG COMPLETE STORY

जब श्री कृष्ण ने अघासुर का वध किया 




अघासुर पूतना और बकासुर का छोटा भाई था
कृष्ण को मारने के लिए अघासुर ने अजगर का रूप धारण कर लिया और मार्ग में लेट गया। उसका वह अजगर शरीर एक योजन लम्बे बड़े पर्वत के समान विशाल एवं मोटा था।अघासुर का यह रूप देखकर बालकों ने समझा कि यह भी वृंदावन की कोई शोभा है। उसका मुंह किसी गुफा की तरह दिखता था। बाल-ग्वाल उसे समझ न सके और कौतुकवश उसे देखने लगे। देखते-देखते वे अजगर के मुंह में ही घुस गए। लेकिन श्रीकृष्ण अघासुर की माया को समझ गए।

अघासुर बछड़ों और ग्वालबालों के सहित भगवान श्रीकृष्ण को अपनी डाढ़ों से चबाकर चूर-चूर कर डालना चाहता था। परन्तु उसी समय श्रीकृष्ण ने अपने शरीर को बड़ी फुर्ती से बढ़ा लिया कि अजगररुपी अघासुर का गला ही फट गया। आंखें उलट गईं। सांस रुककर सारे शरीर में भर गई और उसके प्राण निकल गए। इस प्रकार सारे बाल-ग्वाल और गौधन भी सकुशल ही अजगर के मुंह से बाहर निकल आए। कान्हा ने फिर सबको बचा लिया। सब मिलकर कान्हा की जय-जयकार करने लगे।

जब श्री कृष्ण ने अघासुर का वध किया | कुरूप व्यक्ति का परिहास करने का परिणाम | अघासुर को अष्टावक्र का श्राप | AGHASUR VADH

महाभारत युद्ध के बाद देवी रुक्मिणी को धर्म अर्थ काम और मोक्ष के बारेमे बताना | दुर्योधन की मृत्यु के बाद बलराम को समझाना |  





महाभारत युद्ध के बाद देवी रुक्मिणी को धर्म अर्थ काम और मोक्ष के बारेमे बताना | दुर्योधन की मृत्यु के बाद बलराम को समझाना |


उत्तंक मुनि अपने क्रोध के कारण अमृत जल से वंचित रह गए | UTTANG RISHI KATHA



श्रीकृष्ण का उत्तंक मुनि के विश्वरूप का दर्शन कराना और मरुदेश में जल प्राप्त होने का वरदान देना

महाभारत के युद्ध में पांडवों की विजय प्राप्ति के उपरान्त श्रीकृष्ण अपने माता-पिता से मिलने द्वारिका जा रहे थे। मार्ग में उन्हें उत्तंक मुनि मिले। यह जानकर कि युद्ध में इतना विध्वंस हुआ है, वे रुष्ट हो गये। मुनि को आशा थी कि, कृष्ण ने भाइयों में मेल करवा दिया होगा। वे कृष्ण को शाप देने के लिए उद्यत हुए पर कृष्ण ने उन्हें वस्तुस्थिति समझाकर, विप्र रूप के दर्शन करवाकर शान्त कर दिया। साथ ही वर दिया कि वे जब कभी कृष्ण को स्मरण करेंगे, उन्हें मरु प्रदेश में भी जल मिल जायेगा। एक दिन प्यास से व्याकुल उत्तंक ने श्रीकृष्ण को स्मरण किया कि, कुत्तों से घिरा हुआ एक चांडाल प्रकट हुआ, जिसके पांव के छिद्र से जल की धारा प्रवाहित थी। उसने मुनि से जल लेने का आग्रह किया। किन्तु मुनि चांडाल से जल लेना नहीं चाहते थे। वह अंतर्धान हो गया तथा श्रीकृष्ण प्रकट हुए। कृष्ण ने बताया कि उनके बहुत आग्रह करने पर इंद्र चांडाल के रूप में अमृत पिलाकर उत्तंक को अमर करने के लिए आये थे, पर मुनि ने अमृत ग्रहण नहीं किया। श्रीकृष्ण ने कहा कि भविष्य में कृष्ण को स्मरण करने पर उन्हें मेधों से जल की प्राप्ति होगी।

उत्तंक ऋषि क्रोध के कारण अमृत जल से वंचित रह गए | UTTANG RISHI KATHA | श्रीकृष्ण का उत्तंक मुनि के विश्वरूप का दर्शन कराना

Mahabharat Jayadrath Vadh



महाभारत में जयद्रथ सिंधु प्रदेश के राजा थे। जयद्रथ का विवाह कौरवों की एकमात्र बहन दुशाला से हुआ था। जयद्रथ वृद्धक्षत्र के पुत्र थे। वृद्धक्षत्र के यहाँ जयद्रथ का जन्म देर से हुआ था और जयद्रथ को यह वरदान प्राप्त था कि जयद्रथ का वध कोई सामान्य व्यक्ति नहीं कर पायेगा, साथ ही यह वरदान भी प्राप्त था कि जो भी जयद्रथ को मारेगा और जयद्रथ का सिर ज़मीन पर गिरायेगा, उसके सिर के हज़ारों टुकड़े हो जायेंगे।

अर्जुन की प्रतिज्ञा

महाभारत का भयंकर युद्ध चल रहा था। लड़ते-लड़के अर्जुन रणक्षेत्र से दूर चले गए थे। अर्जुन की अनुपस्थिति में पाण्डवों को पराजित करने के लिए द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की। अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदने के लिए उसमें घुस गया। उसने कुशलतापूर्वक चक्रव्यूह के छः चरण भेद लिए, लेकिन सातवें चरण में उसे दुर्योधन, जयद्रथ आदि सात महारथियों ने घेर लिया और उस पर टूट पड़े। जयद्रथ ने पीछे से निहत्थे अभिमन्यु पर ज़ोरदार प्रहार किया। वह वार इतना तीव्र था कि अभिमन्यु उसे सहन नहीं कर सका और वीरगति को प्राप्त हो गया। अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार सुनकर अर्जुन क्रोध से पागल हो उठा। उसने प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन सूर्यास्त से पहले उसने जयद्रथ का वध नहीं किया तो वह आत्मदाह कर लेगा। जयद्रथ भयभीत होकर दुर्योधन के पास पहुँचा और अर्जुन की प्रतिज्ञा के बारे में बताया।
दुर्य़ोधन उसका भय दूर करते हुए बोला-'चिंता मत करो, मित्र! मैं और सारी कौरव सेना तुम्हारी रक्षा करेंगे। अर्जुन कल तुम तक नहीं पहुँच पाएगा। उसे आत्मदाह करना पड़ेगा।'
अगले दिन युद्ध शुरू हुआ। अर्जुन की आँखें जयद्रथ को ढूँढ रही थीं, किंतु वह कहीं नहीं मिला। दिन बीतने लगा। धीरे-धीरे अर्जुन की निराशा बढ़ती गई। यह देख श्रीकृष्ण बोले-'पार्थ! समय बीत रहा है और कौरव सेना ने जयद्रथ को रक्षा कवच में घेर रखा है। अतः तुम शीघ्रता से कौरव सेना का संहार करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ो।' यह सुनकर अर्जुन का उत्साह बढ़ा और वह जोश से लड़ने लगे। लेकिन जयद्रथ तक पहुँचना मुश्किल था। 
सन्ध्या होने वाली थी। तब श्रीकृष्ण ने अपनी माया फैला दी। इसके फलस्वरूप सूर्य बादलों में छिप गया और सन्ध्या का भ्रम उत्पन्न हो गया। ‘सन्ध्या हो गई है और अब अर्जुन को प्रतिज्ञावश आत्मदाह करना होगा।’-यह सोचकर जयद्रथ और दुर्योधन ख़ुशी से उछल पड़े। अर्जुन को आत्मदाह करते देखने के लिए जयद्रथ कौरव सेना के आगे आकर अट्टहास करने लगा। 
जयद्रथ को देखकर श्रीकृष्ण बोले-'पार्थ! तुम्हारा शत्रु तुम्हारे सामने खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इसका। वह देखो अभी सूर्यास्त नहीं हुआ है।' यह कहकर उन्होंने अपनी माया समेट ली। देखते-ही-देखते सूर्य बादलों से निकल आया। सबकी दृष्टि आसमान की ओर उठ गई। सूर्य अभी भी चमक रहा था। यह देख जयद्रथ और दुर्योधन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जयद्रथ भागने को हुआ लेकिन तब तक अर्जुन ने अपना गांडीव उठा लिया था। 
तभी श्रीकृष्ण चेतावनी देते हुए बोले-'हे अर्जुन! जयद्रथ के पिता ने इसे वरदान दिया था कि जो इसका मस्तक ज़मीन पर गिराएगा, उसका मस्तक भी सौ टुकड़ों में विभक्त हो जाएगा। इसलिए यदि इसका सिर ज़मीन पर गिरा तो तुम्हारे सिर के भी सौ टुकड़े हो जाएँगे। हे पार्थ! उत्तर दिशा में यहाँ से सो योजन की दूरी पर जयद्रथ का पिता तप कर रहा है। तुम इसका मस्तक ऐसे काटो कि वह इसके पिता की गोद में जाकर गिरे।'

अर्जुन ने श्रीकृष्ण की चेतावनी ध्यान से सुनी और अपनी लक्ष्य की ओर ध्यान कर बाण छोड़ दिया। उस बाण ने जयद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया और उसे लेकर सीधा जयद्रथ के पिता की गोद में जाकर गिरा। जयद्रथ का पिता चौंककर उठा तो उसकी गोद में से सिर ज़मीन पर गिर गया। सिर के ज़मीन पर गिरते ही उनके सिर के भी सौ टुकड़े हो गए। इस प्रकार अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई। 

Jayadrath Vadh Mahabharat | जयद्रथ वध